lekh (samiksha : m m chandra by pustak samiksha

शहरी जीवन की व्यंग अभिव्यक्ति : कौआ कान ले गया …………………………………………………………………… समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग संग्रह 90 के दशक के बदलते रंग-ढंग, रहन-सहन या उपभोगतावादी संस्कृति में तबदील होती नई पीढ़ी की दशा का सीधा-सरल किन्तु प्रभावशाली व्यंग्यात्मक विवरण प्रस्तुत करता है. इसमें वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के कारण देश में उस विकास की प्रक्रिया को समझने का मौका मिलेगा जिसमें आम आदमी की जेब देखी जाती है आदमी…

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lekh by chander prabha sood

–                                                                 -समय बड़ा बलवान समय बड़ा बलवान है। बड़े-बड़े राजवंशों व सभ्यताओं को समय के साथ-साथ तहस-नहस होते देखा गया है। इतिहास इसका साक्षी है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। हमें समय के साथ-साथ चलना चाहिए। समय के साथ कदम मिलाकर चलने…

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lekh by chander prabha sood

.     –                                                              – संयुक्त परिवार में विघटन संयुक्त परिवार में विघटन छोटी-छोटी बातों को लेकर होता है। बच्चों व बड़ों की असहिष्णुता इसका मुख्य कारण होता है। दोनों ही पक्ष जब अपने-आपको सही ठहराते हुए दूसरों की बात नहीं सुनना चाहते तो समस्या…

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lekh by pratap singh negi

–                                                      – E – book e- book is a electronic version of a traditional print book. साधारण भाषा में हम कह सकते हैं कि e – book कागज पर छपी किताबों के स्थान पर कम्पुटर द्वारा टाइप किया जाकर इन्टरनेट के माध्यम से हमें पढ़ने के लिए प्राप्त किताबें…

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lekh by chander prabha sood

.=                                                  = स्त्री को समाज में दोयम दर्जा स्त्री को हमेशा से ही दोयम दर्जा दिया जाता है। पुरुषवादी सोच उस पर हमेशा हावी रही। कहने को तो वह लक्ष्मी हैं, सरस्वती है, दुर्गा-काली है पर क्या जीवन में उसे वाकई वह मुकाम मिल पाता है? शायद नहीं। जब तक पुरुष…

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lekh by aman chandpuri

=                                                 =’हिन्दी साहित्य के ‘सुदामा’ थे ‘श्रीश’ जी ‘पूर्वाचल के शब्दर्षि’ और ‘साहित्य-सुदामा’ कहे जाने वाले छायावादोत्तर युग के अन्तिम कवि पंडित सत्यनारायण द्विवेदी ‘श्रीश’ हिन्दी साहित्य जगत में अपना एक विशेष स्थान रखते हैं। इनका जन्म अम्बेडकर नगर (तत्कालीन फैजाबाद) के सेठवां गाँव में 12 अक्टूबर 1920 ई. में पंडित…

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lekh by Ankit kuma

अभी बिहार मे चुनाव की घोषणा के बाद अलग अलग राजनीतिक दलो के द्वारा अपने उम्मीदवारो की घोषणा की गई तो लगभग सभी दलो मे दल बदल की बाढ सी आ गई ।जिनको भी इस बार टिकट नही दिया गया उन्होंने रातों रात पाली बदल ली ।लगभग सभी दल बदले नेता के वक्तव्य भी एक जैसे आ रहे है। जैसे पार्टी अपने विचारों से भटक गई है।कुछ चमचे टाइप लोगों की पहुँच संगठन के ऊपर…

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lekh by chander prabha sood

=-                                                                         -. कन्या भ्रूणहत्या कन्या बचाओ मुहिम बहुत जोरों से चल रही है। भ्रूणहत्या का विरोध भी बहुत मुखर रूप से किया जा रहा है। सोशल मीडिया व सामाजिक संगठनों ने इस समस्या के विरोध में कमर कस ली…

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lekh by shyam snehi sahstri

प्रसंगवश   :     देश विभाजन और अराजकता का षड्यंत्र   आरक्षण आन्दोलन   गुजरात में आरक्षण आन्दोलन और इसके नौजवान नेता हाएदिक पटेल की गिरफ्तारी साथ ही उस परिपेक्ष्य में नेट सेवा पर प्रतिबन्ध |  कोई मामूली घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए | शांत और समृद्ध प्रदेश का आरक्षण के आग में धू-धू कर जलना किसी सोची-समझी गयी रणनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा तो नहीं ? बाहरी तौर पर बेशक ये आन्दोलन…

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samikshak M.M.Chandar by pustak samiksha

अँधेरे दौर में रोशनी दिखाती कविताएँ  ————————————————– -समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा        आओ कोई ख्वाब बुनें ​ क्या अँधेरे दौर में भी कविता लिखी जायेगी ? क्या अँधेरे दौर की कविता लिखी जायेगी ? हाँ! अँधेरे दौर में भी कविता लिखी जाएगी. अरविन्द कुमार का काव्य संग्रह इस अँधेरे दौर की वह कविता है जो सिर्फ अँधेरे की गहराई और विस्तार का मुआयना ही नहीं करती बल्कि अपने समय के साथ संवाद…

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lekh by chander prabha sood

                                        -तीर्थ स्थलों की दुर्दशा तीर्थ स्थलों की दुर्दशा देखकर मन को कष्ट होता है। मैं किसी एक की चर्चा नहीं कर रही बल्कि कमोबेश सभी तीर्थ स्थानों की यही स्थिति है। बहुत से तीर्थ स्थलों पर जाने का अवसर मिला। सबसे पहले वहाँ प्रवेश करते ही पंडे या उनके चेले पीछे हो जाते हैं। चाहे…

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lekh by sandeep kumar

–                – उत्तराखंडी पर्व खतडुवे पर लेख –                            =कुमाऊँनी पर्व खतडुआ कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्र में शरद ॠतु की प्रथम संध्या का उत्सव खतडुआ कहलाता है।  प्रतिवर्ष यह 17 सितम्बर या उससे एक दिन आगे पीछे मनाया जाता है। देवभूमि में यह पर्व मध्य काल में चन्द्र वंश तथा पँवार वंश के मध्य वैमनस्य का…

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lekh by jaya singh

संबंधों की सामाजिक सीमाएं……….! आप अपने आस पास जिन भी संबंधों से घिरे रहते हैं वह सभी जब आप की सीमाओं को पहचानते और समझते होंगे तभी रिश्ता मजबूत चल सकता है। ये सीमाएं किसी भी तरह की हो सकती हैं जैसे आर्थिक , सामाजिक , और सांस्कृतिक।  अब इन सभी को विस्तार से समझिए। आर्थिक का अर्थ  है , जब भी कभी आप के किसी रिश्ते को मदद की जरूरत पड़े तो उसे ये…

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"lekh by jaya singh"

lekh by aradhana rai ‘ aru ‘

एक काव्यात्मक लेख। नारी तू घर आँगन कि बहार है , या सावन कि ठंडी सी  फुहार है। बहती हवा कि वही ब्यार है , प्रेम -समर्पण कि पुकार है , विश्वास है,जीवन पर  फिर भी इस समाज से बाहर है। पुरुष कि संगनी मात्र बने रहकर हर स्वप्न करती साकार है। कितनी लड़कियां है जो अपने को सार्थक कर पाई। अपने गुणों को विकसित कर पाई या नारी स्वाभिमान का कारण बन पाई। जिस…

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"lekh by aradhana rai ‘ aru ‘"

lekh by chander prabha sood

–                                   -ओल्ड होम्स की आवश्यकता ‘मातृदेवो भव पितृदेवो भव’ अर्थात् माता और पिता को देवता मानने वाले भारत देश में विदेशों की तरह ‘ओल्ड होम्स की आवश्यकता नहीं है। हमारी संस्कृति में बच्चे के पैदा होते ही यह संस्कार कूट-कूट कर भरे जाते हैं कि उन्हें बड़े होकर अपने वृद्ध हो रहे माता-पिता की सेवा करनी है। मैं…

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lekh by sandeep kumar

सुरा देवभूमि और असुर मित्रो आज अचानक एक लेख लिखने का मन हुआ तो सोचा पहाड़ की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण क्या है इस पर विचार करता हूँ बहुत सोचा पलायन भ्रष्टाचार बेरोजगारी आखिर क्या है वो कारक जो पहाड़ जैसे स्थूल को शून्य में धकेल रहे तो बस मन में एक ही ख्याल आया वो कारक है सुरा अर्थात् शराब सुरा ही वह कारक है जो देवभूमि के जनमानस के ह्रदय में आसुरिक…

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"lekh by sandeep kumar"