0220 – Tejvir Singh Tej

Kavita : दुर्मिल सवैया  🌴शिल्प- 8 सगण 12,12 पर यति🌴 यहि आस करूँ ब्रजबास करूँ पद-पंकज नाथ रहूँ नम-तौ। तन छोड़ दियौ धन छोड़ दियौ अरु छोड़ दियौ मन कूं रम-तौ। यह नेह सनेह मिलौ हमकूं अब भावत नाहि कछू कम-तौ। सुख चैन गयौ इन नैनन सों अब तेज भये पगला हम-तौ। Kavita : अरसात सवैया 🌴शिल्प – 7 भगण + रगण🌴 मांगत खात नचावत नाचत नैनन नेह निहारि अनोहतौ। नंद कुमार हमार सखा नित बाट…

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"0220 – Tejvir Singh Tej"

0219 – Preeti Praveen

Kavita : ख़ुशनुमा पल   *** आ भी जाओ ना इंतज़ार में हूँ ख़ुशनुमा पल के दीदार में हूँ   पहले तो स्वयं आ जाया करते थे मनपसंद उपहार भी लाया करते थे   रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित मन ही मन ख़ूब इतराया करते थे   खाने खिलाने का दौर भी चलता था कभी झूठी क़समें तो कभी झूठे वादे   बाँस की ये आरामदायक सी बिछात सामने प्रकृति की मन मोहती छटा   घंटों…

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"0219 – Preeti Praveen"

0218 – Vikram Gathania

Kavita : वहाँ पहाड़ पर ** जिंदगी ही निकालनी हैं यह कैसे भी निकल जाती है जैसे पहाड़ पर जहाँ सीमित हैं साधन न कोई चकाचौंध न ज्यादा हलचल वहीं ही बहलना होता है हवाओं से पंछियों से अपने पशुओं से भेड़ बकरियों से ! वहाँ पहाड़ पर जीने  की ही तरकीबें सोचनी पड़ती हैं इसके अलावा कोई नखरा भी नहीं कोई नाज भी नहीं केवल मासूमियत ही पहने रहनी पड़ती है ! और क्या…

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"0218 – Vikram Gathania"

0217 – Prabhat Ranjan

Kavita : पुत्री/बेटी को समर्पित ***   होंठों पे तेरे हँसी देखकर   होंठों पे तेरे हँसी देखकर एक सुकून सा मिलता है चेहरे पे तेरे जो ये नूर है एक फूल सा खिलता है होंठों पे तेरे . . .   छोटी-सी, नन्ही-सी, प्यारी-सी तू कोई परी लग रही मासूमियत तेरे गालों पे क्या खूब है सज रही तेरी आँखों में आये जो आंसू मेरा मन ये मचलता है होंठों पे तेरे . .…

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"0217 – Prabhat Ranjan"

0216 – Sudha Mishra

Kavita : दर्द   रात  के बाद सुबह हुई तम फिर भी छटा नहीं एक और दिन या हर दिन का मेहमाँ तु हो गया दर्द कुछ कहना चाहे भी तो जुबाँ साथ नहीं देती पर्वत समझ कर पूजा जिसे एक ठोकर से अस्तित्व ही बिखर पड़ी मिट्टी के ढ़ेर सा लड़खड़ा गिरा वो जो पर्वत पूजा किए….   ऐसे ही सारे बंधन जिंदगी से  हाथ छुड़ाकर मौका परस्ती निभाते रहे… हम हमेशा उसी मोड़पर…

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"0216 – Sudha Mishra"

0215 – Kirti Vidya Sinha

Kavita : फूल की ख्वाइश फूल हैं हम डाली पर रहने दो मत छुओ मज़ा तो लेने दो क्यूं तोड़ते हो हमें ज़रा खिलने तो दो हमारे इस गुलशन मे ज़रा महकने दो हम ख़ुद ब ख़ुद ज़मी पर आ जायेंगें पर ज़मी पर आके भी बेदाग रह जायेंगें तब उठा लेना हमें ,तब उठा लेना हमें प्यार से सहला लेना हमें बालों मे लगा लेना हमें हो सके तो कमरे मे पनाह देना हमें…

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"0215 – Kirti Vidya Sinha"

B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra

Kavita : “कश की कश्मकश ” *** सिगरेट, पीना बुरी बात है- सेहत ,रिवायत,मुहब्बत सब के लिये। मग़र, तेरी बेपनाह यादों के जालों से घिरा हुआ इंसान, आखिर, करे भी तो क्या? शायद सिगरेट प्रतीक है- “टूटे आशिकों के ज़ज़्बात को बहलाने का” मैं, सिगरेट इसलिये पीता हूं। क्योंकि मुझे लगता है, तुझे , मेरे करीब सिगरेट ही लायी थी।!! उन दिनों , मैं बेफ़िक्र था। जवां हसरतों का एहसास हुआ था। जब पहली बार…

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"B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra"

0213 – S K Gupta

Gazal : मुहब्बत मेंं वायदे तुम्हे भी निभाने हैंं मुहब्बत में वायदे हमें भी निभाने हैं क्यों नहींं समझते हो बात जरा सी शमां पर पतंगे तो आने ही आने हैंं लोग लम्हों की कीमत नही समझते लम्हा लम्हा कर बीत जाते जमाने हैंं नाम उनका आया जब मेरे साथ में तब पता चला वह भी मेरे दीवाने हैंं बार बार तौबा हमारी टूट जाती है साकी तेरे पास भी तो वह पैमाने हैंं इश्क़…

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"0213 – S K Gupta"

0212 – Shabnam Sharma

Kavita : अंधेरों में तैरते शब्द **   कुछ अंधेरों में जुगनुओं से तैरते शब्द पकड़ने हैं मुझे, पानी में उड़ती तितलियों के परों पर लिखनी है कहानियाँ, पर क्या करूँ, बन्द हो गई है मेरी ज़िन्दगी के कमरे की सारी खिड़कियाँ, कभी-कभी आती है रोशनी की इक किरन, चीर कर, खिड़कियों के मोटे परदों के बीच से, तब तक सिर्फ बुनती हूँ अपना साँसों का स्वैटर और ठिठुर जाती है ज़िन्दगी, कुछ आगे सोचते-सोचते।…

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"0212 – Shabnam Sharma"

0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

Muktak : रिश्तों में बढ़ता दिखे , आज शिकायत दौर. ! भौतिक जग करता नहीं,अब रिश्तों पर गौर !! अब रिश्तों पर गौर, नहीं करती भौतिकता ! भूखी,नंगी रुदन कर रही है नैतिकता !! कह ंअनंग ंकरजोरि,कटे जीवन किश्तों में ! सौदा अथवा बोझ , आज दिखता रिश्तों में !! Muktak : मानव का व्यक्तित्व है, जैसे पुष्प सुगंध ! फैलाओ सद्भाव जग , यह पृभु का अनुबंध !! यह पृभु का अनुबंध, इसे जो…

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"0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’"

0210 – Mithilesh Rai ‘ Mahadev ‘

Muktak : जो साथ नहीं देते वे रूठ जाते हैं! रास्तों में अक्सर हमसे छूट जाते हैं! दूरियाँ बन जाती हैं दिलों के दरमियाँ, हौसले भी जिन्दगी के टूट जाते हैं! Muktak : मैं भूला था कभी तेरे लिए जमाने को! मैं भूला था कभी अपने आशियाने को! भटक रहा हूँ जबसे गम के सन्नाटों में, हर शाम ढूँढता हूँ जामे-पैमाने को! Muktak : तेरी चाहत मेरे गुनाह जैसी है! तेरी चाहत दर्द की आह…

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"0210 – Mithilesh Rai ‘ Mahadev ‘"

0209 – Pratap Singh Negi

Kavita : “ अलविदा ” चला गया वो कल , अपनी निशानी छोड़ कर I ता – उम्र भूला ना सकूँ एक ऐसी  कहानी छोड़ कर I तडपता रह गया ये दिल मेरा प्यासा I हो गया , वो रुखसत , पलकों में पानी छोड़ कर I निगाहें , ताकती रह गयी मेरी उसको I वो जुदा हो गया कहा कर , अलविदा मुझको I Kavita : “ अपने पराये ” कहाँ गए  वो  रिश्ते …

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"0209 – Pratap Singh Negi"

B 0208 – Ramesh Raj

Kavita : ।। अब पढ़ना है ।। ——————————- सैर-सपाटे करते-करते जी अब ऊब  चला अब पढ़ना है आओ पापा लौट चलें बंगला। पिकनिक खूब मनायी हमने जी अपना हर्षाया देखे चीते भालू घोड़े चिड़ियाघर मन भाया तोते का मीठा स्वर लगता कितना भला-भला। अब पढ़ना है आओ पापा लौट चलें बँगला ।| पूड़ी और पराठे घी के बड़े चाव से खाये यहाँ झील, झरने पोखर अति अपने मन को भाये खूब बजाया चिड़ियाघर में बन्दर…

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"B 0208 – Ramesh Raj"

B 0207 – Rifat Shaheen

नज्म : मैं ऐसा महसूस कर रही हूँ के तुम यहीं हो यहीं कहीं हो मेरे सुखन में मेरे चलन में मेरे ख्यालों की अंजुमन में मैं ऐसा…. के तेरी खुशबु में मेरी सांसे रची बसी है तुम्हारी आहट मैं सुन रही हूँ मैं बुन रही हूँ तेरे ख्यालों के रेशमी आंचलों को मैं सोचती हूँ के तुम मिले तो मैं ये कहूंगी,मैं वो कहूँगी तुम्हारा दामन मैं थाम लुंगी न जाने दूंगी कहीं मैं…

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"B 0207 – Rifat Shaheen"

B 0206 – Vinod Sagar

Kavita : ~- इंतज़ार -~~~ एक तेरे आने की ख़ुशी एक तेरे जाने का ग़म, आँख़ों में अश्क़ों के मेले दर्द ही अब मेरा मरहम। चन्द पलों का साथ तेरा और उम्रभर की जुदाई, मैं तेरी याद में मर रहा तुम्हें याद ना मेरी आई। जब प्यार हमारा बच्चा था दिल भी हमारा सच्चा था, आज जो यहाँ रुसवाई है कल तलक सब अच्छा था। तेरे जाने के बाद तो सनम जीवन जैसे शमशान है,…

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"B 0206 – Vinod Sagar"

0205 – Ishaan Sharma , Anand

गज़ल : तेज़ लहरों पर सफीना आ गया। मुश्किलों के साथ जीना आ गया।। . तीर तेरे सब जिगर के पार हैं। आज मेरे काम सीना आ गया।। . कुछ परिन्दे इस कद़र ऊँचे उड़े। आसमानों को पसीना आ गया।। . ऐक तेरे इश्क में जलता रहा। दूसरा सावन महीना आ गया।। . आग सीने की बुझाने क्या गये? दिलजलों को जाम पीना आ गया।। . फरवरी की सर्द रातों में हमें। आतिशे-ग़म से पसीना…

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"0205 – Ishaan Sharma , Anand"

0204 – Anand Singhanpuri (त्रिदेव राज आनन्द किशोर)

Kavita : ”दर्द की चुभन ” दर्द के मयखाने में, बैठा हूँ | कोई आवाज तो दे दो, सुनलो हमारी नगमों गजल जरा उठकर दाद तो दे दो || उसकी विरहन मासूम अदायिगी | किस तरह कायल कर गई , चुभती दिल पर दर्द की अंगड़ाई , हमें घायल कर गई अब आस लगाये हैं , कोई हमें साथ तो दे दो || सुनलो हमारी नगमों गजल जरा उठकर दाद तो दे दो || जी…

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"0204 – Anand Singhanpuri (त्रिदेव राज आनन्द किशोर)"

0203 – Brij Vyas ( Bhagwati Prasad Vyas “Neerad” )

Kavita : ” धर्म हमारा बड़ा लचीला ” मन्त्रों में , वेदों में है वो , पत्थर की मूरत में है वो | ना मानो तो निराकार है , मानो तो घट घट में है वो | नहीं बंदिशों में बाँधा है – सचमुच है यह बड़ा रंगीला || मात-पिता हैं तीरथ जैसे , गुरुजनों की बात निराली | दुखीजनों की पीड़ा समझी , टल जाती ग्रह दशा हमारी | साधु-संतों ने ज्ञान दिया है…

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"0203 – Brij Vyas ( Bhagwati Prasad Vyas “Neerad” )"

0202 – Shanti Swaroop Mishra

  Gazal : डर है कि कहीं वो, बेवफ़ा न हो जाए ! बे-सबब ये ज़िंदगी, तबाह न हो जाए ! वो तो बेख़बर है दुनिया की चालों से, फंस कर कहीं वो, गुमराह न हो जाए ! फ़ितरत बदलते नहीं लगती देर यारो, गलती से कहीं उससे, गुनाह न हो जाए ! दोस्ती का भरोसा भी न रहा आज कल, कहीं प्यार किसी से, बेपनाह न हो जाए ! सोचते रहिये दोस्त बस ये…

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"0202 – Shanti Swaroop Mishra"

0201- Ved Pal Singh

कविता : मेरा गुनाह ………………………. इक गुनाह मैं बार बार करता हूँ, के कातिल को अपने घर लाता हूँ। क्योंकि सिर्फ खुदा से डरता हूँ, बाकी किसी से खौफ नहीं खाता हूँ।। जानता हूँ इस जमाने को मैं खूब, रोज़ ये मुझको पागल कहता है। मुझको मेरे ही कायदों से हटाने की, ये हर वक्त जुगत में रहता है।। मैं अपने कायदों से फिसलता नहीं, बल्कि और चिपकता जाता हूँ। क्योंकि सिर्फ खुदा से डरता…

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"0201- Ved Pal Singh"