0224 – Binod Kumar

Kavita : विधा:-वीर/अल्हा छंद  -शिल्प:-१६,१५ चरणान्त गाल/२१ —– बार बार मेधा घोटाला, सही नहीं हो काँपी जाँच। होता अपना राज्य कलंकित, सदा साख पर आती आँच। जिसे कभी मिलता है अवसर, एक ध्येय पैसे की लूट। योग्य भले ही फेल हो रहे, माफिया राज रहे अटूट। अंग्रेजी की काँपी जाँचे, सदा पढ़ाते जो विज्ञान। नहीं ज्ञान पर टॉपर बनते, मेधा का छीने मुस्कान।   Kavita : बिहार में इंटरमीडिएट परीक्षा परिणाम २०१७ पर प्रतिक्रिया स्वरूप…

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"0224 – Binod Kumar"

0223 – Sudhir Gupta ‘ Chakra’

Kavita : डॉक्टर का पत्र पत्नी के नाम मेरी प्यारी एन्टीबायोटिक सरला स्वराज सुबह, दोपहर, शाम प्यार की तीन मीठी सी खुराक डरता हूँ इसलिए विनम्र निवेदन करता हूँ मुझ गरीब से तुम क्यों दूर रहती हो इतना स्टेन्डर्ड कम्पनी की महंगी दवाई रहती है मुझसे जितना मैं तुम्हारे प्यार का हार्ट पेसेन्ट हूँ सेन्ट परसेन्ट हूँ ऐसा डॉक्टर ने बतलाया है क्योंकि एक्सरे में तुम्हारा चित्र स्पष्ट नजर आया है तुम्हारी जुदाई मुझे ब्लड…

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"0223 – Sudhir Gupta ‘ Chakra’"

0222 – Asha Shailly

Gazal : ऐसे भी कोई छोड़ता है गाँव को घर को, जैसे खिज़ां में छोड़ते हैं बर्ग शजर को? ग़म साथ बाँध कर सफ़र के वासते चले हैरत से देखते हो क्यों सामान-ए-सफर को खुद पर भी नज़र रख न सकी उम्र कट गई पहचान लू मैं किस तरह दुश्मन की नज़र को वो चार दिन के वासते आया था शहर में इक उम्र पालती रही मैं उसके असर को बस आज में जो जी…

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"0222 – Asha Shailly"

0221 – Dinesh Pratap Singh Chauhan

Kavita : “राजनीति की कविता” धंधे और व्यापार हो रहे ,राजनीति में अब तो सौ के कई हजार हो रहे,राजनीति में अब तो जनता के ही बीच के प्रतिनिधि होते थे पहले तो पेश कई अवतार हो रहे,राजनीति में अब तो राज बदल लो चेहरे बदलो बदले मगर न किस्मत अलीबाबा के यार हो रहे,राजनीति में अब तो पर उपदेश कुशल बहुतेरे ब्रह्म सूत्र सत्ता का उपदेशक भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो पढ़ लिखकर…

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"0221 – Dinesh Pratap Singh Chauhan"

0220 – Tejvir Singh Tej

Kavita : जय जय श्रीराधे…..श्याम   कुंजन निकुंजन में खेल-खेल लुका-छिपी समझे हो मन-मांहि बड़े ही खिलार हौ। धार कें उंगरिया पै थारी बिन पैंदे वारी करौ अभिमान बड़े तीक्ष्ण हथियार हौ। देखौ रण-कौशल हू भागि भये रणछोर अरे डरपोक कहा भौंथरी ही धार हौ। हमऊँ हैं ब्रजबासी झांसे में यों नाय आवैं तेज भले कितने हो पर तुम गमार हौ।   खेल रह्यौ घात कर जीत की न बात कर घने देखे तेरे जैसे…

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"0220 – Tejvir Singh Tej"

0219 – Preeti Praveen

Kavita : ख़ुशनुमा पल   *** आ भी जाओ ना इंतज़ार में हूँ ख़ुशनुमा पल के दीदार में हूँ   पहले तो स्वयं आ जाया करते थे मनपसंद उपहार भी लाया करते थे   रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित मन ही मन ख़ूब इतराया करते थे   खाने खिलाने का दौर भी चलता था कभी झूठी क़समें तो कभी झूठे वादे   बाँस की ये आरामदायक सी बिछात सामने प्रकृति की मन मोहती छटा   घंटों…

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"0219 – Preeti Praveen"

0218 – Vikram Gathania

Kavita : स्पंदित चेतन सृष्टि के खूबसूरत चेहरे युवा स्त्रियों के खिले गुलाबों की मानिंद स्पंदित चेतन हैं सृष्टि के वे गुलाब हैं उगे हुए संस्कारित जो सलवार कुर्ता ब्रा के संस्कारों से तुम यह सब नहीं कर सकते इसलिए तुम सलवार कुर्ता ब्रा पहनी हुई अपने हिस्से की स्त्री की तुलना किसी से  नहीं करते वह अद्वितीय है तुम्हारे लिए !   Kavita : यह सच है यह जो मंजर है आँखों के सामने…

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"0218 – Vikram Gathania"

0217 – Prabhat Ranjan

Kavita : पुत्री/बेटी को समर्पित ***   होंठों पे तेरे हँसी देखकर   होंठों पे तेरे हँसी देखकर एक सुकून सा मिलता है चेहरे पे तेरे जो ये नूर है एक फूल सा खिलता है होंठों पे तेरे . . .   छोटी-सी, नन्ही-सी, प्यारी-सी तू कोई परी लग रही मासूमियत तेरे गालों पे क्या खूब है सज रही तेरी आँखों में आये जो आंसू मेरा मन ये मचलता है होंठों पे तेरे . .…

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"0217 – Prabhat Ranjan"

0216 – Sudha Mishra

Kavita : सुनो हुक्मरानों सुनो…   सुनो हुक्मरानों सुनो  आँख से परदा उठाओ अपनी-अपनी गद्दी से उतरकर बताओ क्या खूब बेटी बचा रहे हो क्या खूब बेटी पढा रहे हो कहाँ रहते हो ,कहाँ सोते हो,कहाँ जगते हो? जो महीने तक भी नींद नहीं खुलती और जो बेटियाँ झेल रही हैं जान से हाथ धो रही हैं… बस तुमसब को नहीं दिखतीं नहीं देख पाते दर्द किसी का तो गद्दी से उतारकर रहेंगे होश में…

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"0216 – Sudha Mishra"

0215 – Kirti Vidya Sinha

Kavita : आम का पेड़ ** मेरे आंगन का वह आम का पेड़ मेरे बचपन का वह आम का पेड़ माँ के हाथ की अचार में सनी रोटी झूला झूलते हुये लम्बी सी चोटी वह गुलगुले वह मीठे पराठे आम के पेड़ के नीचे बैठ कर हम खाते मेरे आंगन ——————– जब लगी मैं दहलीज लाघंने माँ की होने लगी हिदायतें पर था वह आम का पेड़ जो देता था कुछ मुस्कराहटें रोती खुश होती…

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"0215 – Kirti Vidya Sinha"

B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra

Kavita : “कश की कश्मकश ” *** सिगरेट, पीना बुरी बात है- सेहत ,रिवायत,मुहब्बत सब के लिये। मग़र, तेरी बेपनाह यादों के जालों से घिरा हुआ इंसान, आखिर, करे भी तो क्या? शायद सिगरेट प्रतीक है- “टूटे आशिकों के ज़ज़्बात को बहलाने का” मैं, सिगरेट इसलिये पीता हूं। क्योंकि मुझे लगता है, तुझे , मेरे करीब सिगरेट ही लायी थी।!! उन दिनों , मैं बेफ़िक्र था। जवां हसरतों का एहसास हुआ था। जब पहली बार…

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"B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra"

0213 – S K Gupta

Gazal : वो तमाम घर मेंं खुशी बिखेर देती थी नए से लहजे की हंसी बिखेर देती थी सुबह जब मेरी आंख नहींं खुलती थी हंस के मुझ पर पानी बिखेर देती थी भीगे रेशमी बालों को लहराकर अपने नथुनों में महक सोंधी बिखेर देती थी अपने कंधे से सरका के पल्लू हौले से मेरे वजूद में भी मस्ती बिखेर देती थी दिल मेंं रूमानियत का ख्याल आते ही नज़र में अपनी मर्ज़ी बिखेर देती…

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"0213 – S K Gupta"

0212 – Shabnam Sharma

  Kavita : पिता कन्धे पर झोला लटकाए, खाना व पानी लिये, देख सकते दौड़ते-भागते पकड़ते लोकल ट्रेन, बसें। लटते-लटकाते, लोगों की दुतकार खाते, कभी घंटे भर का तो कभी घंटों का सफर करते। ढूंढते पैनी नज़रों से, कहीं मिल जायक हाथ भर बैठने की जगह, मिल गई तो वाह-वाह, वरना खड़े-खड़े करते, पूर्ण वर्ष ये सफर। पहुँच दफतर, निबटाते काम, खाते ठंडा खाना, पीते गर्म पानी, बचाते पाई-पाई। लौटते अंधेरे मुँह घर, कल फिर…

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"0212 – Shabnam Sharma"

0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

  Muktak : सदगुण हों यदि शुरू से , लें अपनापन खींच ! आत्मीयता , धैर्य को , पैदा करते सींच. !! पैदा करते सींच , न आती मन अधीरता ! सफल पारिवारिक जीवन की खिले वीरता !! कह ंअनंग ंकरजोरि,निकालो सारे दुर्गुण. ! शनैः शनैःभर लेउ खींचकर अन्दर सदगुण. !! ** घर में सुख की खोज,करो सुख लाओ ऊपर ! स्वयं सिद्ध सुख ही स्थाई. होता भू_ पर. !! कह ंअनंग ंकरजोरि,दुखों की करो…

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"0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’"

0210 – Mithilesh Rai ‘ Mahadev ‘

Muktak : दर्द के दामन में चाहत के कमल खिलते हैं! अश्क की लकीर पर यादों के कदम चलते हैं! रेंगते ख्यालों में नजर आती हैं मंजिलें, जब भी निगाहों में ख्वाबों के दिये जलते हैं! Muktak : तेरी याद से खुद को आजाद करूँ कैसे? तेरी चाहत में खुद को बरबाद करूँ कैसे? लब्ज भी खामोश हैं बेबसी की राहों में, तेरी मैं तकदीर से फरियाद करूँ कैसे? Muktak : मेरी जिन्दगी गमें-ख्याल बन…

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"0210 – Mithilesh Rai ‘ Mahadev ‘"

0209 – Pratap Singh Negi

Kavita : “ अलविदा ” चला गया वो कल , अपनी निशानी छोड़ कर I ता – उम्र भूला ना सकूँ एक ऐसी  कहानी छोड़ कर I तडपता रह गया ये दिल मेरा प्यासा I हो गया , वो रुखसत , पलकों में पानी छोड़ कर I निगाहें , ताकती रह गयी मेरी उसको I वो जुदा हो गया कहा कर , अलविदा मुझको I Kavita : “ अपने पराये ” कहाँ गए  वो  रिश्ते …

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"0209 – Pratap Singh Negi"

B 0208 – Ramesh Raj

Kavita : ।। अब पढ़ना है ।। ——————————- सैर-सपाटे करते-करते जी अब ऊब  चला अब पढ़ना है आओ पापा लौट चलें बंगला। पिकनिक खूब मनायी हमने जी अपना हर्षाया देखे चीते भालू घोड़े चिड़ियाघर मन भाया तोते का मीठा स्वर लगता कितना भला-भला। अब पढ़ना है आओ पापा लौट चलें बँगला ।| पूड़ी और पराठे घी के बड़े चाव से खाये यहाँ झील, झरने पोखर अति अपने मन को भाये खूब बजाया चिड़ियाघर में बन्दर…

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"B 0208 – Ramesh Raj"

B 0207 – Rifat Shaheen

नज्म : मैं ऐसा महसूस कर रही हूँ के तुम यहीं हो यहीं कहीं हो मेरे सुखन में मेरे चलन में मेरे ख्यालों की अंजुमन में मैं ऐसा…. के तेरी खुशबु में मेरी सांसे रची बसी है तुम्हारी आहट मैं सुन रही हूँ मैं बुन रही हूँ तेरे ख्यालों के रेशमी आंचलों को मैं सोचती हूँ के तुम मिले तो मैं ये कहूंगी,मैं वो कहूँगी तुम्हारा दामन मैं थाम लुंगी न जाने दूंगी कहीं मैं…

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"B 0207 – Rifat Shaheen"

B 0206 – Vinod Sagar

Kavita : ~- इंतज़ार -~~~ एक तेरे आने की ख़ुशी एक तेरे जाने का ग़म, आँख़ों में अश्क़ों के मेले दर्द ही अब मेरा मरहम। चन्द पलों का साथ तेरा और उम्रभर की जुदाई, मैं तेरी याद में मर रहा तुम्हें याद ना मेरी आई। जब प्यार हमारा बच्चा था दिल भी हमारा सच्चा था, आज जो यहाँ रुसवाई है कल तलक सब अच्छा था। तेरे जाने के बाद तो सनम जीवन जैसे शमशान है,…

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"B 0206 – Vinod Sagar"

0205 – Ishaan Sharma , Anand

गज़ल : कि खँजर हैं दो, पर मयाँ ऐक ही है। सगे भाईयों का मकाँ ऐक ही है।। . मेरे घर में सब आदमी अजनबी हैं। पता ऐक है, आशियाँ ऐक ही है।। . करो तो ज़रा आरज़ू-ऐ-बुलन्दी। ये किसने कहा , आसमाँ ऐक ही है।। . फक़त वाक़िऐ हैं अलग आशिकों के। करो ग़ौर तो दास्ताँ ऐक ही है।। . जहाँ देख कर घर को लौटा तो जाना। सुकूँ से भरा आस्ताँ ऐक ही…

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"0205 – Ishaan Sharma , Anand"

0204 – Anand Singhanpuri (Tridev Raj Anand Kishor)

Kavita : कुछ शब्द बाकी हैं तुझको क्या दूँ, हिसाब दूँ। या किताब दूँ आवाज दूँ या ख़िताब दूँ। सुन तो लो, अभी भी कुछ शब्द बाकी हैं। तेरे मेरे बुनियाद के कुछ फरियाद के कुछ अफ़साने है उन हंसी जज्बात के कुछ शब्द बाकी हैं।। उन लम्हों की दरमियाँ गूंजती चहुँ छोर मन मे फुदकते उचकते ख़्वाब भरे आशाएं कुछ शब्द बाकी हैं।⁠⁠⁠⁠ Kavita : ”जख्म ” जख्म आज भी मेरे हरे हैं |…

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"0204 – Anand Singhanpuri (Tridev Raj Anand Kishor)"

0203 – Brij Vyas ( Bhagwati Prasad Vyas “Neerad” )

Kavita : ” ये आंसू के धारे हैं ” !! दर्द है जगा कहीं , आंखों में नमी नमी ! यादों के जंगल में , कांटों की कमीं नहीं ! कभी छुअन , बनी तड़पन – हम आँसूं भी वारे हैं !! दूर तक है खामोशी , आस है बुझी बुझी ! प्यार की पहेलियां भी , क्यों रही सदा उलझी ! रहे मगन , किये जतन – ये आँसूं भी हारे हैं !! खुशी…

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"0203 – Brij Vyas ( Bhagwati Prasad Vyas “Neerad” )"

0202 – Shanti Swaroop Mishra

  Gazal : बिठा दें चाहे लाख पहरे, ये जमाने वाले ! मगर घुस ही जाते हैं, दिल जलाने वाले ! कर सकते हैं राख उनको भी ये शोले, भला कहाँ सोचते हैं ये, घर जलाने वाले ! अब तो मदद करना भी गुनाह है दोस्तो, नहीं हैं कम इधर, इलज़ाम लगाने वाले ! बड़ा बेरहम है आज का ये जमाना दोस्त, लापता हो जाएंगे, तुझपे जाँ लुटाने वाले ! कहाँ फंस गए ठगों की…

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"0202 – Shanti Swaroop Mishra"

0201- Ved Pal Singh

कविता : हम बहुत करते हैं जब करते हैं ……… हम वो नही करते हैं जो सब करते हैं, मगर सब कहते हैं कि गजब करते हैं। भले गुज़ार दें वक्त खाली कितना भी, मगर हम बहुत करते हैं जब करते हैं। ज़िंदगी ने हमें सताया भी है कई बार, मगर फिर भी उससे हम कब डरते हैं। हम चलने वाले हैं उसूलों की राहों पर, खुदा में यकीन बड़ों का अदब करते हैं। रौशन…

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"0201- Ved Pal Singh"

0223 – sudhir kumar gupta ‘ chakr’

कविता एक कवि कभी नहीं मरता उसके लिए शताब्दियाँ नाम मात्र की भी नहीं हैं क्योंकि कवि की उम्र उसकी कविताएं होती हैं और कविताओं की कोई उम्र नहीं होती।

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"0223 – sudhir kumar gupta ‘ chakr’"