#Dr Krishan Kumar Tiwari Neerav

गजल
बहुत मजबूर हूं क्योंकि यही दिन हैं कमाई के,
पुराने हो रहे हैं बाध अपनी चारपाई के ।
बहुत छोटे हैं जो लगभग सही है आचरण उनका,
बुरे हैं लोग ही इस देश में ज्यादा ऊँचाई के।
बड़प्पन दब गया है एकदम से स्वार्थ के नीचे,
उभरते जा रहे हैं आजकल मुद्दे लड़ाई के।
खुद अपने ईश पर भी भक्त को होने लगी शंका,
हवन के साथ जब से जल गए रोंये कलाई के।
किसी से कम नहीं कोई है इस अंधेर नगरी में,
मैं किसका नाम लूं हैं पात्र बिल्कुल सब बधाई के।
अगर पूछो तो कोई शौक से मरने नहीं आता ,
मुसीबत खींच कर लाती है खूँटे तक कसाई के।
भलाई को जमाने में कभी शोहरत नहीं मिलती ,
मगर मशहूर हो जाते हैं हर किससे बुराई के।
बराबर की मोहब्बत है मुझे औलाद से अपनी,
मैं वालिद हूं विषय में क्या कहूं अपनी सफाई के।
—— डॉ.कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

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