Er Anand Sagar Pandey

पलटकर पोंछ लूँगा आँख से गिरते हुए आंसू

कहा मुझसे किसी ने कल,
बला का दर्द लिखते हो,
कोई तो है जो इन बेइंतहा चीखों के पीछे है,
तुम्हारे होंठ का है दायरा अल्फाज तक लेकिन,
कहीं अफ़सुर्दगी का राज़ इन होठों के नीचे है।
कहां मुझसे किसी ने कल,
बला का दर्द लिखते हो ।
हँसा मैं जोर से उस पर,
थमा फिर हँसके यों बोला,
मैं उनमें से नहीं जो शायरी को ग़म बताते हैं,
बताते हैं कि सारे हर्फ़ एहसासात हैं उनके,
जिगर अफ़सुर्द औ पलकों को अपनी नम बताते हैं,
हँसा मैं जोर से उस पर,
थमा फिर हंसके यों बोला ।
सुखनवर हूंँ, है फ़न मेरा,
किसी माशूक का रोना नहीं है,
मेरे अल्फ़ाज़ मेरी सोच के कमरे से आते हैं,
तजु़र्बा ज़िंदगी का है जो मेरी शायरी में है,
फकत उनको ही मेरे लब सुखन में गुनगुनाते हैं,
सुखनवर हूँ, है फ़न मेरा,
किसी माशूक का रोना नहीं है ।
हांँ हांँ मैं मानता हूंँ,
बला का झूठ कह डाला,
मगर मैं और क्या करता सिवा इसके,
कहानी जो दबा रखी है अरसे से ज़ेहन में,
कहो क्या खोल देता इस तरह से सामने उसके,
हांँ हांँ मैं मानता हूंँ,
बला का झूठ कह डाला ।
मगर यह झूठ अब दुनिया है मेरी,
इसी के साथ जीने चल पड़ा हूंँ,
छुपाता हूंँ सभी से शायरी में गम की सच्चाई,
कहीं फिर से कोई तोहमत मोहब्बत पर न लग जाए,
कहीं खामोश ना हो जाए चाहत की शहनाई,
यही कि झूठ अब दुनिया है मेरी,
इसी के साथ जीने चल पड़ा हूंँ ।
सुनो तुम याद आती हो,
मगर मैं झूठ बोलूंँगा,
कहूँगा कुछ नहीं है शायरी में दर्द के पीछे,
पलट कर पोंछ लू़्ँगा आँख से गिरते हुए आंसू,
हँसूगा, बोल दूंगा कुछ नहीं है होंठ के नीचे,
सुनो मैं झूठ बोलूँगा
मगर तुम याद आती हो ।।।

-अनन्य देवरिया

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