#Gazal by Aasee Yusufpuri

ग़ज़ल

शोला कोई हवा में उठा और बुझ गया
पहले से दिल ये था ही बुझा और बुझ गया

महफ़िल से दूर कितने ही परवाने रह गए
जो दफ़्अतन चराग़ जला और बुझ गया

मुट्ठी में ले के आप तो बस खेलते रहे
जुगनू सिफ़त था दिल ये मेरा और बुझ गया

शब का सकूत चीरती पुरदर्द ये सदा
शायद कहीं पे एक दिया और बुझ गया

महफ़िल सजी थी दौर चले शब हुई तमाम
आसी जला चराग़े वफ़ा और बुझ गया
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सरफ़राज़ अहमद आसी

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