#Gazal by Aasee Yusufpuri

उसकी  फ़ितरत  है  ज़माने से लिपट कर रोना

मुझको  आता  नहीं  तहज़ीब  से हट कर रोना

 

इम्तहाँ बोझ था जब तक रहा तिफ़्ले  मकतब

वो  किताबों  के  वरक़  रोज़  पलट  कर  रोना

 

काश ! मिल जाये वो रोने  का ज़माना  मुझको

माँ से फिर रूठ के बादल सा वो फट कर रोना

 

कितनी  मासूम  सी   लगती  हैं   पुरानी  यादें

वक़्ते रुख़सत वो तेरा ख़ुद में सिमट कर रोना

 

उम्र  भर  मुझको  रुलाएगा  वो  अन्दाज़  तेरा

जाते   जाते   वो   तेरा  यार  पलट  कर  रोना

 

उसके  रोने   का था  अन्दाज़  निराला   आसी

कभी   सीने  से  कभी  पीठ  से  सट कर रोना

आसी यूसुफ़पुरी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.