#Gazal by Alka Jain

जिस गली गुजरू वहीं आजमाते हैं दिवाने

रुप मेरा तकते रहते हैं दिवाने रंग तेरा गोरा
दिन रात मुझे छेड़ते हैं  दिवाने रूप ने
मुश्किल किया अंजुमन से निकलना
आंख गलती से मिल गई एक जवान से
यार   गोरी मैं तेरा मुसलसल दिवाना
आंख से आंसू उतार दुंगा इश्क कर ले
तेरा दामन खुशी से भर दूंगा इश्क कर
रानी बना कर रखूंगा कबूल कह लें यार
एक बार नहीं तीन  तीनबार कह गुजर
अफसोस कभी तेरे फेसलै पर नहीं होगा
वादे का पक्का निकला दिवाना
सपने सच सारे कर दिये बस ताज नहीं बना
आंख से आंसू उतार लें गया दिवाना
दिवाना मेरा मुसलसल दिवाना यार दोस्तों

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