#Gazal by Alok Shrivas

 

सूनी आँखों का मंजर  तुम्हे दिखलाएँ कैसे।

प्यार के गीत शुष्क होठों से गुनगुनाएँ कैसे।।

 

है पड़ी बंजर जमीं कब से इस मेरे दिल की।

बिन सावन आंखों का तेरी  लहलहाएँ कैसे।।

 

बेतरतीब सी ये जिंदगी  उलझन में है घिरी।

ये वो अलकें नहीं तेरी फिर सुलझाएँ कैसे।।

 

खामोशियाँ दीवार की इस कदर है चीखती।

तेरी आवाज की सरगोशियाँ हम लाएँ कैसे।।

 

बहुत आसान था भुला देना मेरी उल्फ़त को।

मेरी धड़कन है, तू ही बता तुम्हे भुलाएँ कैसे।।

 

हिज़्र की लत ये अब ऐसे पड़ी सनम हमको।

जलता है मन आग सी इन्हें हम बुझाएँ कैसे।।

 

माहिर हो सुना है तुम  इस प्यार के  खेल में।

दिल से खेलने वाली को भला सिखाएँ कैसे।।

 

छुप गया है  चाँद भी  अब देख कर के तुझे।

तू अमावस  नहीं है  ये उन्हें  समझाएँ  कैसे।।

 

जिस्म से रूह का सफर  जो कर लिया हमने।

समंदर साँसों का खाली है ये अब बताएँ कैसे।।

 

तेरी आँखों के काजल का कतरा हूँ ‘आलोक’।

तेरी पलकों पे बैठा हुआ हूँ तुम्हे दिखाएँ कैसे।।

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