#Gazal by Amit Shukla ( Vishal Shukla )

पेशानी पर यूं ही बल अच्छे नहीं।

हर बात पर जो दें दखल अच्छे नहीं।

वो झोपड़ी अच्छी जहां सब साथ हों।

बिखरे हों रिश्ते वो महल अच्छे नहीं।

कुछ सवाल तुम्हें हमें बाँधे हुये तो हैं।

कर दें गर अलग ऐसे हल अच्छे नहीं।

हर वक़्त तुम्हारा साथ हो या याद तुम्हारी।

बाकी फिर जो भी बचें वो पल अच्छे नहीं।

कपडों और जुबान से तय हो रहे मजहब।

हालत मेरे शहर के आजकल अच्छे नहीं।

तबीयत हर किसी से कैसे करें साझा।

हाल अमित दिल के दरअसल अच्छे नहीं।

@अमित शुक्ला@

479 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.