#Gazal by Amod Bidouri

बड़ा शह्र है ये अपना पता  नहीं मिलता।।

यहाँ बजूद भी हँसता हुआ नहीं  मिलता।।

 

दरख़्त देख के लगता तो आज भी ऐसा ।

के ईदगाह में अब भी खुदा नहीं मिलता।।

 

समाज ढेरों किताबी वसूल गढ़ता है।

वसूल गढ़ता ,कभी रास्ता नहीं मिलता।।

 

मैं पढ़ लिया हूँ कुरां,गीता बाइबिल लेकिन ।

किसी भी ग्रन्थ में , नफरत लिखा नहीं मिलता।।

 

मुझे भी दर्द ओ तन्हाई से गिला है पर।

करें भी क्या कोई हमपर फ़िदा नहीं मिलता।।

 

मुझे भी अपनी मुकम्मल ही दोस्ती करनी।I

यूँ बावफ़ा को मगर बावफ़ा नहीं मिलता।।

 

हुजूर आप भी अपनी कभी कहीं कह दो।

ये बीच बीच का ख़ाली शमा नहीं मिलता।।

 

समझ का फेर है अपनी समझ नहीं पाए।

हरेक शख्स भी उलफत मढ़ा नहीं मिलता।।

 

मुझे भी रात की तन्हाई नोंच खाती है।

अमास दौर भी कोई चाँद सा नहीं मिलता।।

 

लिए गरीब के , संसद सा भोजनालय हो।

तड़प वो भूख से मरता हुआ नहीं मिलता।।

 

हयात आँख मिचौली भी खेल लेगी पर ।

शऊर मरना या जीना, अता नहीं मिलता।।

 

जरा सा तोड़ कुचल और नया नुश्खा लो ।

हमारे देश सियासत में क्या नहीं मिलता।।

 

मेरा भी दिल है मुहब्बत में धड़कता तुम सा।

अलग ये बात है लहजा जरा नहीं मिलता।।

आमोद बिन्दौरी

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