#Gazal by Amod Bindouri

होश खोकर मैं न पल्लू में सिमट जाऊं कहीं।।

‘इस तरह बहकूँ न होटों से लिपट जाऊँ कहीं’।।

 

‘डरते डरते आज अपनी उम्र के इस खेल में ।

 

इश्क़ के दो बोल सुनकर ही न पट जाऊँ कहीं’।।

 

‘ये फ़ज़ाएँ शौख़ कमसिन छेड़ती हैं जिस्म को।

 

कांपते हैं ये क़दम मैं न रपट जाऊँ कहीं’।।

 

एक जर्रा चाहता हूँ प्यास से झुलसा हुआ।

कि समंदर बावला ले कर उलट जाऊं कहीं।।

 

जिंदगी के पथ में मेरा एक ही आमोद  है।

मैं सृजन करते हुये ही बस निपट जाऊं कहीं।।

 

आमोद बिंदौरी /मौलिक अप्रकाशित

 

 

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