#Gazal by Amod Bindouri

एक तरफ़ा हो नहीं सकता कोई भी फैसला।।

दर्द दोनों ओर देगा ये सफर ये रास्ता।।

 

बीज अब वो ,फासले के आज कल बोने लगा ।

फसल अब नफरत की वो भी चाहता है काटना।।

 

अब रकाबत का असर आया है रिस्ते में मेरे।

दूर तक अब  दिख रहा है फासला ही फासला।

 

लाख समझाया मगर उनको समझ आया नहीं।

दम मुहब्बत तोड़ देगी, गर नहीं होंगे फ़ना।।

 

बस जरा सा मुस्कुराई, हल हुई सब मुश्किलें।

फर्क अब पड़ता नहीं ,मैं बावफ़ा वो बेवफा।।

 

मुझको मुझसे ज्यादा जाने, ज्यादा समझे कौन है।

मां समझ जाती  है मेरी ,आह क्या है, दर्द क्या ।।

 

मैं भी समझा मुफलिसी से प्यार को नफरत नहीं।

प्यार भी दौलत से घुलकर, क्षण में इक ओझल हुआ।।

 

हौसला विस्वास मेरा बस यही इक जो भी है।

बज़्म में दौलत की घुटने टेकते जो दिख रहा ।।

 

क्या  समाजिक तौर उलफत का कोई ओहदा नहीं??

क्यों वो हाँ में हाँ मिलाता आज सबकी दिख रहा।

आमोद बिन्दौरी /

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