#Gazal By Amrendra Lavnya ‘Anmol’

तमाम बाजार की सोई किस्मत उठने लगी
गरीब घर से चला सारी कीमत उठने लगी ।

दिये जलाए कि घर हो रौशन पर अफसोस ये
चिराग जलते सितारों में दहशत उठने लगी

पनाह मिलता नही था दर दर था पर आज से

उजार छप्पर हुआ छत तो इज्जत उठने लगी

लहू बहाकर भी नही है इक छत मजदूर को
चुरा चुरा कर रखा उसकी दौलत उठने लगी

इधर तमाशा उधर तन्हाई है कुछ साजिश
बवाल इस बात पर बोला शामत उठने लगी

कहाँ कहाँ ढूँढता जाए वो बेबस बारहा
अभी अभी बैठता ही था हालत उठने लगी

नसीब भी खूब क्या मारा मारी करता रहा
हिसाब करने लगा मेरी नीयत उठने लगी ।।
अमरेन्द्र लावण्या “अनमोल”

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