#Gazal by Anand Pathak

जो बदतर थी हालत सम्भलने लगी है

पत्थरों से शबनम पिघलने लगी है।

 

मेरे गांव आने की, खबर लग गई है

सुना है वो छत पर, टहलने लगी है।

 

चले आओ के फिर, नहीं हम  मिलेंगे

जिंदगी हाथ से ये, निकलने लगी है।

 

प्यार के महल रेत के खंडहर हैं

हाथों से रेत ये, फिसलने लगी है

 

चलन ये हुआ है,के माशूक़ बदलो

रस्म-ए-मोहब्बत, बदलने लगी है।

 

परेशां हूँ क्योंकि,मेरे दोस्तों को

मेरी कामयाबी भी, खलने लगी है।

 

–आनंद पाठक–

बरेली (उत्तर प्रदेश)

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