#Gazal by Anand Pathak

,- तड़प

 

बुझने को थी मगर शमा, हंस कर जला गया कोई

हमपे तीर-ए-नज़र नया, हंस कर चला गया कोई।

 

अंधेरों में डूबा हुआ, वीरान सा था दिल मेरा

दिल मे चिंगारी नयी, हंस कर लगा गया कोई

 

उसके लबों को छूने की, हसरत सी दिल मे थी मगर

ये प्यास मेरे लबों की थी, हंस कर बुझा गया कोई।

 

किसी को देख लें जरा, जुल्फ भी संवार दें

सोई हुई उम्मीद को, हंस कर जगा गया कोई।

 

अब तलक तो द्वार पे होतीं ना थी ये हलचलें

आज मेरे द्वार को, हंस कर हिला गया कोई।

 

हँसते हुये पिया तो था, जाम दर्द का मगर

राख-ए-सुकून जाम में, हंस कर मिला गया कोई।

 

—आनंद पाठक—

बरेली (उत्तर प्रदेश)

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