#Gazal by Anand Pathak

जो नजर के तीर तेरे, सरेआम लग रहे हैं
इन्हें देख मेरे अरमाँ, बे-लगाम लग रहे हैं।

तेरी चाहतों का ऐसा, ये असर हुआ है मुझ पर
जो लिखे थे खत किसी को, तेरे नाम लग रहे हैं।

इन्हें देखकर ख़ुदाया, मैं नशे में गुम हुआ हूँ
ये जो चश्म हैं सनम के, मुझे जाम लग रहे हैं।

ये फ़लक से चाँदनी की, जो फ़िज़ा बिखर रही है
मुझे आज कुछ सितारे, लबे बाम लग रहे हैं।

मैं तो बावफ़ा हूँ फिर भी, मुझे बेवफा बताया
वो ख़िलाफ़ आज मेरे, खुलेआम लग रहे हैं।

मैं शुमार पागलों में, भी किया गया हूँ अक्सर
मुझे राह के जो पत्थर, ये क़याम लग रहे हैं।

तुझे फ़र्क़ गर नहीं कुछ, है पड़ा सनम से पाठक
उड़े फ़ाख्ते तिरे फिर, क्यूँ तमाम लग रहे हैं।

—आनंद पाठक—
बरेली (उत्तर प्रदेश)
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