#Gazal by Anshu Jain Anshu

नयी सी है ये मेरे ख़्याल की खुश्बू

मुझे भायी है पिछले साल की खुश्बू

 

हवा के साथ उड़ के रोज़ आती है

वतन की माटी में है कमाल की खुश्बू

 

बहुत महफ़ूज़ रखती है वो घर अपना

अगर माँ है तो है जमाल की खुश्बू

 

(महफ़ूज़-सुरक्षित,जमाल-सौन्दर्य)

 

उम्र भर ख़ाक उड़ती है नहीं जाती

फूलों की शोखियों में हाल की खुश्बू

 

(ख़ाक-मिट्टी,शोखियाँ-चंचलता)

 

उसे छू के महकती है हथेली भी

अभी महसूस की है सिफ़ाल की खुश्बू

 

(सिफ़ाल-मिट्टी)

 

तबस्सुम शहर है फिर लौट के जाऊँ

बुलाती है मुझे भोपाल की खुश्बू…।

 

(तबस्सुम-मुस्कुराता)

 

✍जैन ‘आँसू’

 

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