Gazal by Asha Shailli

खुशबुए-गुल की तरह मैं भी बिखरकर देखूँ
ख़्वाब में  साथ तेरे आज सफ़र कर देखूँ

ये हवाएँ मुझे ले जाएँ जिधर भी चाहें
सामने मैं कोई  पुरनूर-सा मंज़र देखूँ

एक मुद्दत यूँ भटकना था नसतबों में मेरे
दिल में हसरत थी, कभी अपना भी मैं घर देखूँ

सर्दियाँ ज़ोर पे हैं, काम बहुत बाकी है
रात भी सर पे खड़ी अब तो मैं बिस्तर देखूँ

उसने हरदम ही तराशा है मिरी ग़ज़लों को
क्यों न मैं एक जवाल अपने हुनर पर देखूँ

ये तकाज़ा है अक़ीदत का ज़माने वालो
अपने रहबर को मैं, संसार से बढ़कर देखूँ

प्यार की शर्त लिखी उसने नई क्या शैली
उस के ख़त को भी ज़रा-सा तो मैं पढ़कर देखूँ

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