#Gazal by Asha Shailly

मिरे मकान में हर सिम्त खिड़कियाँ रक्खीं
हरेक ताक पे फिर उसने बिजलियाँ रक्खीं

हुनर को उसके बार-बार मरहबा कहिए
चमन की शाख़-शाख़ जिसने आँधियाँ रक्खीं

बनाए जिस्म बशर के धड़कते दिल रक्खे
न जाने उनमें जुबानें कहाँ-कहाँ रक्खीं

आँख को अश्क के नूरानि मोतियों से भरा
मरहबा! दौलतें पलकों तले निहाँ रक्खीं

दयार-ए-दिल को मिरे सब्र की भी बख्शिश दे
जो तूने गर्दिशों में मेरी कश्तियाँ रक्खीं

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