#Gazal by Asha Shailly

गुज़र जाएगी यह शब हौसला रख
सुबह के वासते दर को खुला रख

सज़ा दे-दे या खुद को माफ़ करदे
अंधेरे में न तू यूँ फैसला रख

वो मुंसिफ़ कुछ नहीं सुनता किसी की
न उसके पास अपना मामला रख

कई मज़लूम होंगे इस जहाँ में
सभी के वासते लब पर दुआ रख

न रो-रो कर कटेगी उम्र सारी
तू मुस्कानों की दामन में ज़िया रख

बहुत हैं चाहने वाले तुम्हारे
तू शैली दामने दिल को तो वा रख

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