#Gazal by Asha Shailly

कितनी गहरी झीलें हैं
कुछ ग़म की तफ़सीलें हैं

छेड़ न उसके ज़ख़्मों को
रूह में गहरी कीलें हैं

बच्चों की हंसती आँखें
या रौशन कंदीलें हैं

दो पल तू भी हंस के देख
सुख की बहुत सबीलें हैं

ग़म यूँ उथले कर जैसे
दीवाली की खीलें हैं

रात-रात भर जगने की
पुख़्ता बहुत दलीलें हैं

कैसे मिलें उसे शैली
ऊँची बहुत फसीलें हैं

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