#Gazal by Asha Shailly

जब भी चमकी रौशनी तो राज़ जंगल का खुला
इस बियाबां में भी है कोई दिया जलता हुआ

मुन्हसर यह तुम पे था तुम रोक सकते थे उसे
कारवां को रह गए बस देखते जाता हुआ

रोकना दरिया को तो मुशकिल नहीं लेकिन जनाब
बाँध जब टूटा तो पाओगे नगर डुबा हुआ

आप को सहना पड़ेगा उसका गुस्सा भी हुज़ूर
आप के हाथों ही सीना चाक पर्वत का हुआ

तेज़ तूफ़ानी नदी में एक तिनके का वुजूद
वो किसी शायर का शयद ख्वाब था देखा हुआ

किस ने ठण्डा कर दिया है इन का सब जोश-ो-खरोश
ऊँघती नस्लों पे शैली है नशा छाया हुआ

Leave a Reply

Your email address will not be published.