#Gazal by Atul Kumar Shukla

हिन्दी गजल–

 

आज समंन्दर जलते देखा,

पर्वत को कर मलते देखा।

 

जिनका सूरज उगा नही भी,

उनका सूरज ढलते देखा।

 

वैसे गिरगिट रंग बदलते है

अब उसको रंग बदलतें देखा।

 

हिम तो पत्थर हुवे जा रहे,

पत्थर को हमने गलते देखा।

 

कब से ठहरा रहा बेचारा,

आज हिमालय चलते देखा।

 

वह सम्हला-सम्हला लगता ही है,

उसको अभी फिसलते देखा।

 

सब कुछ खाये बैठे है जो,

सब कुछ उन्हे उगलते देखा।

 

अतुल कुमार शुक्ल–

सिद्धार्थनगर(यू पी)

7408847229

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