#Gazal by Azam Sawan Khan

ग़ज़ल

प्यार की अब टूटती सी वो दीवारें देखते हैं
नफ़रतों के रोज़ अब तो वो नजारें देखते हैं

जी न पायेंगे कभी हो कर जुदा कहते थे ज़ो
दूर होते ही मेरे दूजे सहारे देखते हैं

इस गुलिस्तां को हुआ आखिर ये क्या मेरे ख़ुदा
रोज़ हम डूबी उदासी में बहारें देखते हैं

प्यार से मुझको बुलाता है नहीं भूले भी वो
रोज़ हम जिसकी नज़ाकत के इशारें देखते हैं

हो गया बेदर्द मौसम आज भी बरसा नहीं
रोज़ हम मुरझाये फूलों की कतारें देखते हैं

कौन दिल से निभा आज़म रहा है दोस्ती
टूटते ही वो वफाओं के किनारें देखते हैं

आज़म सावन खान

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