#Gazal by aasee yusufpuri

ग़ज़ल

रोटी,कपड़ा और घर है

बस कहानी मुख़्तसर है

अब परिन्दे ही नहीं हैं

वर्ना मौसम है शजर है

उसकी रंगत पर न जाना

वो तो मिट्टी का समर है

टूटना जिसकी सिफ़त है

आईना अब बा ख़बर है

उंगलियां उठने लगीं अब

तू भी “आसी” औज पर है

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सरफ़राज़ अहमद “आसी”

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*मुख़्तसर थोड़ी

*परिंदे- पंछी

*शजर -वृक्ष

*समर -फल

*औज -बुलंदी

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