#Gazal by aasee yusufpuri

ग़ज़ल

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एक मुद्दत से दिल में बसी है

आज भी वो मगर अजनबी है

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रक़्स करते हैं तन्हाइयों में

मैं हूँ और मेरी आवारगी है

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उसकी यादों की आहट है शायद

हूक सी एक दिल में उठी है

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दर्द रग-रग में उठने लगा है

चोट दिल पर हमारे लगी है

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बन्द रखना दरीचे  घरों के

इन हवाओं की नीयत बुरी है

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उसके चेहरे पे चेहरे कई हैं वह यक़ीनन बड़ा आदमी है

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ज़िन्दगी है अभी इन दीयों की

हल्की-हल्की अभी रौशनी है

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जान जाये तो पहलु में उसके

“ये तमन्ना मेरी आख़री है”

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जब मैं चलता हूँ नज़रें झुका कर

लोग कहते हैं “आसी” वली है

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सरफ़राज़ अहमद “आसी”

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