#Gazal by Aasee Yusufpuri

ग़ज़ल

 

मयस्सर भी न  था  क़तरा जहाँ,

दरिया निकल आया

तुम्हारी बज़्म से घबरा के जब प्यासा निकल आया

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मुसलसल जुस्तजू तेरी कहीँ रुकने नहीं देती

जहाँ मंज़िल मेरी ठहरी वहां रस्ता निकल आया

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खुदा जाने मुहब्बत में तुम्हें क्या क्या समझ लेता

तुम्हारे जिस्म से अच्छा हुआ साया निकल आया

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लगा है सिलसिला ज़ख्मों का दिल से,शाख़ से गोया

कोई सूखा हुआ पत्ता गिरा ताज़ा निकल आया

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तेरे दीदार  की प्यासी हमारी रह गयीं आँखें

बहुत परदे उठाये फिर भी इक पर्दा निकलआया

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जतन कितना करूँ आख़िर मैं तुझको भूल जाने का

जलाने जब भी बैठा ख़त तेरा चेहरा निकल आया

 

 

ये मंज़र देखकर “आसी” बहुत हैरान है गुलचीं

जहां वो ख़ार बोया था वहां ग़ुन्चा निकल आया

 

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सरफ़राज़ अहमद आसी

ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश

2 thoughts on “#Gazal by Aasee Yusufpuri

  • January 28, 2016 at 5:14 am
    Permalink

    bahot khoob waaaaaaaaaaaaah

  • January 31, 2016 at 12:03 pm
    Permalink

    Bahut khoob behtareen khoobsurat ghazal sir

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