#Gazal by Adil Sarfarosh

शाम-ए-ग़ज़ल 🌴🌴

अपने ही मुकद्दर की मारी मुफलिसी
फिर अमीरी से बाज़ी हारी मुफलिसी

देखते हैं लोग अक्सर इसको घूर के
फटे हुए कपड़ों में प्यारी मुफलिसी

रोज़ी नहीं रोटी नहीं और अब तो यारों
पानी के लिए कतार में हमारी मुफलिसी

बैठे थे खुशियों की राह में कब से
आ गयी लेकर नयी बीमारी मुफलिसी

जाने किस गुनाह की सज़ा पा रही है
मरती नहीं तड़पती है बेचारी मुफलिसी

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