# Gazal by Dr. Yasmeen Khan

चमन से दूर सरे राह आये बैठी हूँ।

मज़ारे इश्क़ पे सर को झुकाये बैठी हूँ।।

तुम्हारे तीर से मजरूह दिल हुआ बेशक।

मैं अपनी आंख में तुमको बसाये बैठी हूँ।।

समझ के देख तो आख़िर ये माजरा क्या है।

तिरे ही ख़वाब से मैं लौ लगाये बैठी हूँ।।

दिखाई कुछ न अगर दे तो रुक नहीं जाना।

मैं रौशनी के लिए दिल जलाये बैठी हूँ।।

उलट-पुलट के तिरा जिक्र ही तो चलता है।

तिरी ही याद की मजलिस जमाये बैठी हूँ।।

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