#Gazal by Lal Chand Jaidiya “Jaidi”

गज़ल
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झलकता है नूर ये, हुस्नो-रवानी का
क्या राज है तेरी इस भरी जवानी का।

मुद्दतो सबर रखा है, बङा सहज कर
खोल दीजिऐ पट, कातिल कहानी का।

बे’ताब हम भी है, इक झलक पाने को
ढुंढते राह दर-बदर रूप की रानी का।

फरेब-ऐ-नज़र आता है पैगामे-उल्फत
तश्कीन हूं,पा कर अन्दाज रूहानी का।

जुसतजू है बहुत, खिलबते-खास की
शोख-जलवा डराऐ मुझे, दिवानी का।

तलबगार है ये सुखनबर”जैदि”फ़कत
रंगत-ए-रूखसारे-सनम, सुहानी का।

लाल चन्द जैदिया “जैदि”

हुस्नो-जवानी:-हुस्न और जवानी
रवानी:-जोश
पट:-द्वार
सबर:-सन्तोष
फरेब-ऐ-नज़र:-दृष्टि-भ्रम
पैगामे-उल्फत:-प्रेम-संदेश
तश्किन:-सन्तुष्टि
जुसतजू:-इच्छा
खिलबते-खास:-एकान्त मिलन
शोख-जलवा:-शरारती भाव-भंगिमाऐ
तसब्बुरे-हयात:-जीवन की कल्पना
रंगत-ए-रूखसारे-सनम:-प्रेयसी के मुख मंडल की सुहानी आभा ।
सूखनबर:-शायर

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