#Gazal by Pankaj Sharma parinda

ब़हर — 2122 2122 212

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जब हक़ीक़त झूठ से टकरा गयी

सल्तनत तब झूठ की घबरा गयी।

बे-ख़बर थे  वक़्त  की जो  मार से

ज़िन्दगी उनकी क़फ़स में आ गयी।

मुफ़लिसी को पालता हूँ आज कल

सादगी  ही  हाथ  में  पकड़ा  गयी।

हौसला तब ख़ाक में मिलने  लगा

तीरग़ी  जब  रोशनी  को खा  गयी।

बद ज़ुबानी  कर  रहे  माँ बाप  से

शाइरी  यह  देख कर  शरमा गयी।

फ़लसफ़ा है  दौरे’ हाज़िर  का यही

आग पंकज की ग़ज़ल भड़का गयी।

पंकज शर्मा “परिंदा”

खैर ( अलीगढ़ )

9927788180

2 thoughts on “#Gazal by Pankaj Sharma parinda

  • July 20, 2016 at 8:00 am
    Permalink

    wahhhhhhh!
    gajab

  • July 25, 2016 at 12:38 pm
    Permalink

    आभार आदरणीय शुक्ला जी

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