#Gazal by Prakash Prabhakar

गजल

 

बेरूखी  यार की   बनके   सम  रह गई

ये  जबाँ भी अब होकर  बेदम  रह  गई

 

कुछ  ना बोलेगी  ये  उनकी अदा ठहरी

देखें  क्या अब  नजरें  भी  कम  रह गई

 

उनका  अंदाज भी  बदल  के  रह  गया

प्यार में बिखरी वो  एक  कसम रह गई

 

खेल समझा  दिल  का  लगाना  जिसने

दुनियाँ  उनकी  भी  उर्यां हरदम रह  गई

 

हम  रहें क्यों काशअब  सफर में  तन्हाँ

मंजिल भी जमाने  में  दो  कदम  रह गई

 

                           प्रकाश प्रभाकर

उर्यां — nacked

सम— जहर

230 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.