#Gazal by Rajinder Sharma Raina

भीड़ में गुम सा घूमता फिरता,

आदमी खुद को ढूंढता फिरता।

याद उसको घर भी नही अपना,

ख़ाक गलियों की छानता फिरता।

जेब में अपनी है नही आना,

जेब दूजे की देखता फिरता।

हीर को ढूंढे है कभी रांझा,

बन भिखारी है मांगता फिरता।

नाम प्याला जो पिये आशिक,

मस्त दीवाना झूमता फिरता।

इश्क में खोये होश ही अपनी,

यार के दर को चूमता फिरता।

वो रहे मन में ही तेरे रैना”

तू कहां उसको खोजता फिरता। रैना”

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