gazal by rajinder shrama raina

नारें तो बस नारें हैं तू नारों पे न जा,
चार दिन की बहारें है बहारों पे न जा।
पानी के जैसे हर रंग में ढलना सीख ले,
टूट कर फना हो होगा सितारों पे न जा।
दिवारों के कान होते ये अक्सर कहते लोग,
अपनों से चौकन्ना रह दिवारों पे न जा।
धरती अब तक वीरों से न खाली मेरे यार,
देश भक्तों की गिनती कर गद्दारों पे न जा।
कौम की खिदमत करने वाले होते दो चार,
बात वफ़ा की करने अब हजारों पे न जा।
हारे हैं जो दिल की बाजी क्या देंगे सकून,
हंस हंस के रुला दें ग़मगुसारों पे न जा।
लगन लगी रैना”को उसको पाने की इच्छा,
पकड़ ले उसका दामन यूं गवारों पे  न जा। रैना”

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