#Gazal by SHANTI SWAROOP MISHRA

तक़दीर कुछ ऐसी है, कि मैं ग़म उठाये जा रहा हूँ !
उल्फत की झूठी आस में, दिल लगाए जा रहा हूँ !

ये तो वक़्त का मसाला है न जाने कब सुलझेगा,
न आजमाया जिन्हें अब तक, आजमाए जा रहा हूँ !

जफ़ाओं के तीरों ने कर दिया घायल मेरा दिल,
मगर न जाने क्यों, मैं वफ़ा के गीत गाये जा रहा हूँ !

दिलों के ज़हर ने तोड़ डाले प्यारे से रिश्ते नाते,
फिर भी न जाने क्यों, मैं नुस्ख़े आजमाए जा रहा हूँ !

ज़रा सा दूर है ग़मों के दरिया का साहिल “मिश्र”,
पर खुद को न जाने क्यों, भंवर में फंसाए जा रहा हूँ !

शांती स्वरूप मिश्र

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