#Gazal by SHANTI SWAROOP MISHRA

अजब खेल है अजब तमाशा !
है हर कोई दौलत का प्यासा !

भाग रहा है लथपथ लथपथ,
फिर भी मिलती घोर निराशा !

तोड़ दिए इस दौलत ने रिश्ते
बदल गयी अपनों की भाषा !

अब प्यार मोहब्बत पीछे छूटे,
बस नफ़रत का है मन में बासा !

मात पिता अब दिल में खटकें,
अब संतति की बदली परिभाषा !

हैं इतने निष्ठुर ये दुनिया वाले,
अब नहीं किसी में मोह ज़रा सा !

शांती स्वरूप मिश्र

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