#Gazal by Vikas Pal

अपने मित्र दीपक कुमार कुशवाहा को समर्पित——

बहस थी– ऐसा नहीं वैसा नहीं है।
जो भी जैसा दिख रहा वैसा नहीं है।

तअज्जुब है कि पुतलों के जहाँ में
कोई पुतला आदमी जैसा नहीं है।

ज़िल्लती है ज़ाबिता से आँख बाँधे
मत पूछिए ये मज़हबी कैसा नहीं है।

दोस्ती निभती नहीं है दोस्तों को
विदा कह दूँ पास में पैसा नहीं है।

किरणे कुहासा भेद करके आयँगी
धुंध  ही छायी रहे ऐसा  नहीं है।

——विकास पाल

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