#Gazal by Devesh Dixit

ग़ज़ल  (बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम)——

 

हमारी ज़िंदगी में हर क़दम तूफ़ान आये हैं

चले हैं जिस तरफ़ सब रास्ते वीरान आये हैं

 

न पूछो मुफ़लिसी के दौर में कैसे गुज़ारे दिन

हुए फाँके अगर घर में तभी मेहमान आये हैं

 

रिवायत है ज़माने की बनाईं कोठियां जिसने

बुढ़ापे के समय हिस्से महज़ दालान आये हैं

 

बताएं हाल क्या तुमको सफ़र-ए-जिन्दगानी का

कभी पतवार छूटी है, कभी तूफ़ान आये हैं

 

चलो अब फेंक दो पत्थर,गुनाहों से करो तौबा

ख़बर ये भी नहीं तुमको कि अब रमज़ान आये हैं

देवेश दीक्षित

Leave a Reply

Your email address will not be published.