#Gazal by Dharmendra Mewada

 

गजल

कोई मलेरिया कहता है, कोई वायरल समझता है।

मगर बुखार की बेचैनी को बस, बीमार समझता है।

स्वास्थ्य से दूर कैसा हूँ, खर्च में चूर केसा हूँ।

ये मेरा दिल समझता है, या मेरा बील समझता है।

बीमारी एक अहसासों की, टुच्ची सी कहानी है।

कभी तो नब्ज दिखानी थी, कभी धड़कन सुनानी है।

यहाँ सब लोग कहते है, मेरी बॉडी में गर्मी है।

जो तू समझे तो फीवर है, न समझे तो जवानी है।

समंदर पीड़ा का अंदर है,लेकिन रो नही सकता ।

यह बिल ऑफिस में दिखना है, इसको में खो नही सकता।

मेरी बीमारी को हव्वा , बनाने वाले सुनले।

मुझे वायरल से ज्यादा और अब कुछ हो नही सकता।

रोगी नर्स पर अब लो ,मचल बैठा तो हंगामा।

हमारे दिल में कोई ख्वाव ,पल बैठा तो हंगामा।

अभी तक डूब करसुनते थे, क़िस्सा बीमारी का ।

में बीमारी को मोहब्बत में ,बदल  बैठा तो हंगामा।

🙏 कवि धर्मेन्द्र (मेवाड़ा) राजपूत💐

 

 

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