#Gazal by Dipti Gour ‘Deep’

इंसान बन रहे हैं क्यों हैवान की तरह l

गुलशन बदल रहे हैं क्यों वीरान की तरह l

उल्फत वफा के रिश्ते सभी मतलबी हुए ,

सब बिक रहे हैं  फलसफे  ईमान की तरह l

सबके लहू का रंग एक -सा है दोस्तों,

फिर घूमते शहर में क्यों शैतान की तरह l

तुम अपनी शख्सियत को रखो खुद संभालकर ,

बिकने लगी है सियासत सम्मान की तरह l

आलम हरेक  सिम्त है बेचारगी का क्यों ,

है ‘दीप’ भी तो गुमसुम अनजान की तरह l

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