#Gazal by Dr. Krishan Kumar Tiwari Neerav

गजल

अपनी किस्मत से ये होता हम भी टकराते कभी ,

जिंदगी भर के सभी दुख दूर हो जाते कभी ।

तब पता चलता पसीने का निकलना धूप में ,

आप भी जब ले कुदाली खेत में जाते कभी ।

दब गए हैं लोग कितना मुफलिसी के भार से ,

मैंने देखा ही नहीं है इनको मुस्काते कभी ।

चंद पैसों पर जो रिक्शा खींचते हैं शहर में ,

काश इनके भी सपन साकार हो जाते कभी ।

अपने हित में चांद के उस पार तक दिखता तुम्हें ,

हम निगाहों में तुम्हारी क्यों नहीं आते कभी ।

डाह बुझ जाती हकीकत में हमारे वक्ष की ,

आप भी मेरी तरह जब ठोकरें खाते कभी ।

यह तो कहिए इंद्र की कुर्सी नहीं तुमको मिली ,

वरना ये बादल नहीं मुझपे बरस पाते कभी।

आंख दुखती है हमारी देखकर अक्सर तुम्हें ,

तुम हमारे सामने से दूर हो जाते कभी ।

क्या करूं मजबूर हूं वरना किसी के सामने ,

शर्म लगती है मुझे भी हाथ फैलाते कभी ।

— डॉ कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

 

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