#Gazal by Dr Krishan Kumar Tiwari Neerav

गजल
यह गरीबी का दुख भोगते भोगते,
बाल पकने लगे झेलते झेलते ।
आज तक कर्ज का बोझ उतरा नहीं,
उम्र आधी हुई सोचते सोचते ।
रोजमर्रा का अब खर्च कैसे चले ,
दर्द करता है सिर जोड़ते जोड़ते ।
अब मुझे रात भर नींद आती नहीं ,
रात कटती सदा जागते जागते ।
मेरे सम्मुख अभी कल जो पैदा हुये,
सब जवाँ हो गए देखते देखते ।
अब गरीबों को कुछ कोई देता नहीं,
आत्मा रो उठी माँगते माँगते ।
अपने हिस्से में दुर्भाग्य ऐसी रही,
घर तलक ढ़ह गया बांटते बांटते ।
मेरी तकदीर जाने कहां खो गई,
थक गया मैं उसे खोजते खोजते ।
—-डॉ.कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

Leave a Reply

Your email address will not be published.