#Gazal by Dr Krishan Kumar Tiwari Neerav

गजल
किसी दिन हमारा भी घर देख लेते ,
मैं करता हूं कैसे गुजर देख लेते ।
मिलते जहां खुद ही आदाब करते ,
अगर तुम हमारी उमर देख लेते ।
दुकानों पे अखबार आया तो होगा,
कहीं चलके ताजी खबर देख लेते।
बहुत दे दिया मेरी किस्मत ने धोखा,
नहीं आज हम भी शहर देख लेते ।
मरना अगर इतना आसान है तो ,
जरा तुम भी खाकर जहर देख लेते।
चली जा रही जिंदगी नफरतों में ,
मोहब्बत का कुछ तो असर देख लेते।
मदद आजकल लोग करते उसी की ,
कहीं से जिसे सब जबर देख लेते ।
—–डॉ.कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

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