# Gazal by Dr. Ramesh Kataria Paras

आज़ एक तरही गज़ल

 

उसका पावन मन देखा है

फूलों सा उपवन देखा है

 

बसे हुए है मन में कान्हा

जबसे वरंदावन देखा है

 

घर उसका मन्दिर लगता है

जबसे प्रेम सदन देखा है

 

अब पचपन भी देखेंगे हम

अब तक तो बचपन देखा है

 

धन दौलत की इस दुनियाँ में

हर कोई दुशमन देखा है

 

क्या ।कर लेगा एक विभीषण

घर घर में रावण देखा है

 

वो क्या समझेगा आज़ादी

जिसने सिर्फ़ दमन देखा है

 

सबने देखे हँसते चेहरे

किसने कब क्रंदन देखा है

 

मन के अंदर देखो पारस

तुमने सिर्फ़ बदन देखा है

 

Dr रमेश कटारिया पारस

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