#Gazal by Dr Sulaxna Ahlawat

हवस को चढ़ाकर मोहब्बत का नकाब,

वेलेंटाइन डे पर इज्जत करते खराब।

 

दोष किसको दें हम, समझ नहीं पा रहे,

लड़कियों को भी भाते ऐसे ही नवाब।

 

वासना में लिप्त भटकते इधर उधर ये,

कोई पूछता नहीं, मर्ज क्या है जनाब।

 

माता पिता समझा नहीं पाते शुरू में,

फिर वो देते फिरते सवालों के जवाब।

 

समय का अभाव, आधुनिकता की मार,

मिट्टी में मिला देते सारे सुनहरे ख्वाब।

 

संस्कृति और संस्कार के इत्र के बिना,

कहाँ से महकेंगे आज के युवा गुलाब।

 

खुद को संभालना होगा इस परिवेश में,

वरना नई पीढ़ी को चुकाना होगा हिसाब।

 

“सुलक्षणा” तेरे हाथ में भविष्य की डोर,

तराश उसे ऐसा, हर जगह मिले खिताब।

 

©® डॉ सुलक्षणा

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