#Gazal by Dr.vivek saxena

दर्दे दिल अपनों से बाँटें
पर अपनों को कैसे छांटें
रही स्वार्थी नजर सदा ही,
कैसे खुलतीं मन की गांठें
जो आदर्श बने थे अपने
वे दूजों के तलवे चाटें
महंगाई की चली हवा तो
खड़ी हुई हैं सबकी खाटें
रिश्तों के जो बीच बनी
आओ ऐसी खाई पाटें

डॉ विवेक सक्सेना

96 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *