#Gazal by Dr.vivek saxena

दर्दे दिल अपनों से बाँटें
पर अपनों को कैसे छांटें
रही स्वार्थी नजर सदा ही,
कैसे खुलतीं मन की गांठें
जो आदर्श बने थे अपने
वे दूजों के तलवे चाटें
महंगाई की चली हवा तो
खड़ी हुई हैं सबकी खाटें
रिश्तों के जो बीच बनी
आओ ऐसी खाई पाटें

डॉ विवेक सक्सेना

272 Total Views 6 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *