#Gazal by Govind Charan

वक्त की इन राहो मे कितना आजमाओगे।

जमीन पर हूं और कितना जमीं पे लाओगे।।

 

परेशां तो खुद ही हूं अपनी नाकामी पर

पता न था कि तुम भी यूं खिल्ली उड़ाओगे।।

 

खुद ही के हाथो मे कहा होती है तकदीर

वक्त ने चाहा तो तुम भी ठहर जाओगे।।

 

जब वक्त ही सजा दे रहा है सरेआम।

मालूम है अब तुम भी नही बुलाओगे।।

 

जिस कदम वक्त सही हो निकला हमारा

सब नाकामियां भूल तुम भी गले लगाओगे।।

 

भले ही स्वर मे बदलाव है और लहजे मे भी।

पर इन आंधियो मे संभलो तो चल पाओगे।।

 

🖊गोविन्द चारण

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