#Gazal by Harpershad Pushpak

जिस पर भी एतवार किया है।
उसने ही छिपकर बार किया है।।

शीतलता मांगी थी जब भी।
हाथों में  बस अंगार दिया है ।।

बात सफेदी की करता पर ।
कालिख का व्यापार किया है ।।

झाँक रहा जो आसमान से ।
उसे मसीहा नाम दिया है ।।

बना मसीहा जो मजलूमों का ।
खुद को ही आवाद किया है ।।

वही नसीहत बाँटते पुष्पक।
हदों को जिसने पार किया है।।

लौट रहे थे जो किनारे पर ।
उनकों फिर मझधार किया है।।

कसमे वादे वफा दिखा कर ।
कैसा यह उपहार दिया है ।।

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