#Gazal by Ishaan Sharma Anand

यह बदन खैरात का है, सांस भी एहसान है

जिंदगी है धर्मशाला आदमी मेहमान है ।

 

खींच कर मेरी कलाई पूछता है क्या हुआ?

हाथ में हैं नब्ज़ फिर भी हाल से अनजान है

 

है जिगर में होंसला तो कर बला का सामना,

देखकर यूं मुश्किलों को भागना आसान है।

 

क्या सही है? क्या ग़लत? में ही फंसा है आदमी,

ज़ात, मज़हब झूठ हैं सब, सच फक़त ईमान है।

 

ख़ाक से फिर ख़ाक तक का ही सफ़र है ज़िन्दगी,

ख़ाक मैं हूं, ख़ाक तू है, खा़क हर इन्सान है।

 

रंग पल पल आदमी के यूं बदलते देखकर,

वक्त, मौसम और गिरगिट, हर कोई हैरान है

 

ईशान शर्मा “आनन्द”

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