#Gazal by Ishaan Sharma Anand

कि खँजर हैं दो, पर मयाँ ऐक ही है।
सगे भाईयों का मकाँ ऐक ही है।।
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मेरे घर में सब आदमी अजनबी हैं।
पता ऐक है, आशियाँ ऐक ही है।।
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करो तो ज़रा आरज़ू-ऐ-बुलन्दी।
ये किसने कहा , आसमाँ ऐक ही है।।
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फक़त वाक़िऐ हैं अलग आशिकों के।
करो ग़ौर तो दास्ताँ ऐक ही है।।
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जहाँ देख कर घर को लौटा तो जाना।
सुकूँ से भरा आस्ताँ ऐक ही है।।
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तेरा ग़म, ग़रीबी, शराफत , मुकद्दर।
कि दुश्मन कईं और जाँ ऐक ही है।।

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